Saturday, April 11, 2015

विरासत पर दावेदारी

आखिर किसके हैं आंबेडकर?
आखिर आंबेडकर किसके हैं ? आंबेडकर को पहले हम संविधान निर्माता के रूप में जानते रहे. फिर उन्हें दलितों के नेता के रूप में समझाया गया. अब उन्हें 'घर वापसी' का समर्थक बताया जा रहा है. जैसे जैसे 14 अप्रैल करीब आ रहा है अंबेडकर की विरासत के दावेदार बढ़ते जा रहे हैं. कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही इस बार कुछ ज्यादा जोर शोर से आंबेडकर जयंती मनाने जा रहे हैं.

बीएसपी के आंबेडकर
डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर की विरासत पर अब तक सबसे बड़ी दावेदार बहुजन समाज पार्टी रही है. बीते कई बरसों में 14 अप्रैल का दिन बीएसपी के लिए बेहद खास होता था. आंबेडकर जयंती को बीएसपी के कार्यकर्ता धूमधाम से तो मनाते ही थे, मायावती के शासनकाल में तो सरकारी कार्यक्रम भी बड़े स्तर पर आयोजित किए जाते थे. इसे सेलीब्रेशन का शोर कहें या कुछ और, लेकिन इस बार बीएसपी भीड़ में कहीं गुम नजर आ रही है.

आरएसएस के आंबेडकर
आंबेडकर  को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की धारणा पर लगा पर्दा उठ गया है. संघ के मुखपत्र 'ऑर्गनाइजर' द्वारा अंबेडकर को 'घर वापसी' का समर्थक साबित करने की कोशिश की जा रही है. इस बारे में ऑर्गनाइजर के संपादक प्रफुल्ल केतकर कहते हैं, 'वह उस राजनीतिक इस्लाम की मूल आत्मा के आलोचक थे, जो हिंदुओं की कमजोरियों का फायदा उठाता है और अपराध का रास्ता अपनाता है. जब पाकिस्तान और हैदराबाद जैसे प्रांतों में अनुसूचित जाति के हिंदुओं का जबरदस्ती धर्मांतरण किया गया, अंबेडकर ने इसके खिलाफ आवाज उठाई और धर्मांतरित किए गए हिंदुओं का दोबारा स्वागत करने की बात कही. एक तरह से उन्होंने घरवापसी का समर्थन किया.'

संघ प्रमुख मोहन भागवत आंबेडकर की विचारधार को पहले ही हिंदूवादी बता चुके हैं. हाल ही में उन्नाव में एक सम्मेलन में भागवत ने बताया कि दत्तोपंत ठेंगड़ी आंबेडकर के चुनाव एजेंट थे और अंबेडकर ने कहा था कि संघ के स्वयंसेवक और विचारधारा सामाजिक एकता की प्रतीक है. ठेंगड़ी की एक किताब का प्रसंग उठाकर भागवत ने यहां तक कहा कि अंबेडकर चाहते थे कि भगवा ही राष्ट्रध्वज बने और संस्कृत राष्ट्रीय भाषा.

कांग्रेस के आंबेडकर
कांग्रेस इस बार अंबेडकर जयंती वैसे ही मनाने जा रही है जैसे नेहरू की 125वीं जयंती मनाई गई. इस बार अंबेडकर की भी 125वीं जयंती है. कांग्रेस की ओर से 14 अप्रैल से पूरे साल कार्यक्रम आयोजित किए जाने हैं, जिनमें आंबेडकर के योगदान और उनके लेखों का प्रचार प्रसार किया जाएगा. खास बात ये होगी की इन कार्यक्रमों पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी की सीधी नजर होगी. कहा जा रहा है कि कांग्रेस को अब इस बात का डर लगने लगा है कि बीजेपी कहीं सरदार पटेल की तरह अंबेडकर की विरासत पर भी धावा न बोल दे.

बीजेपी के आंबेडकर 
दलित वोटों को साधने के लिए बीजेपी खुद तो लगी ही है केंद्र सरकार में उसकी सहयोगी लोक जनशक्ति पार्टी के नेता राम विलास पासवान इसमें काफी मददगार साबित हो रहे हैं. प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में बाप-बेटे की जोड़ी ने मोदी की खूब तारीफ की जबकि बीएसपी नेता मायावती और आरजेडी नेता लालू प्रसाद को जम कर कोसा.

इस बीच बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी ने जनता परिवार को लेकर लालू का न्योता ठुकरा कर साफ कर दिया है कि बीजेपी और उनके बीच खिचड़ी भले ही अधपकी हो, मगर चूल्हे से उतरी नहीं है. वैसे भी मांझी का मोर्चा अब तक कोई राजनीतिक दल का रूप नहीं ले सका है. बिहार चुनावों को देखते हुए बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह 14 अप्रैल को पटना में कार्यकर्ता सम्मेलन भी करने जा रहे हैं. इतना ही नहीं दलित वोटरों के रिझाने के लिए बीजेपी नेता के 'खि‍चड़ी भोज' की घोषणा पहले ही कर चुके हैं.

दिलचस्प बात ये है कि आप के बागी धड़े ने भी गुड़गांव में 14 अप्रैल को ही 'स्वराज संवाद' का आयोजन किया है - और इसमें दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को भी निमंत्रण दिया है.

'एक कुआं, एक मंदिर, एक श्मशान' का नारा देने के बाद संघ सवर्णों को दलितों के साथ भोज-भात पर जोर दे रहा है. बीजेपी नेता जहां खिचड़ी भोज करने जा रहे हैं तो वीएचपी नेता प्रवीण तोगड़िया ऐसे आयोजनों के फोटो व्हाट्सएप और फेसबुक पर शेयर करने को प्रोत्साहित कर रहे हैं. संघ ने घर वापसी के अपने एजेंडे में अब आंबेडकर को भी जोड़ने की कोशिश की है लिया है. आंबेडकर को खुद से कौन कितना जोड़ पाता है इसका सर्टिफिकेट तो चुनाव नतीजे ही होंगे - क्योंकि ये सब हो तो सिर्फ चुनावों के लिए ही रहा है.
# मृगाङ्क शेखर [Cut/Paste from 'http://aajtak.intoday.in' where this article was originally published.]

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