Wednesday, April 8, 2015

मेरा कुछ सामान...

मेरा सारा सामान AAP लौटा दो, प्लीज...

प्रिय AAP, आप और सिर्फ आप,

अब बहुत हो गया. मेरी भी आंखें खुल गईं. भला हो उस इंसान का जिसकी आंख मुझसे भी पहले खुल गई और उसने अपनी वैगन आर 'आप' से मांग ली. उस आर्टिस्ट का भी मैं तहे दिल से शुक्रगुजार हूं, जिसने अपना 'लोगो' वापस मांग कर मेरी आंखें पूरी तरह खोल दी.
मेरी आप से विनम्र गुजारिश है, प्लीज. मेरा भी कुछ सामान AAP के पास पड़ा है. लौटा दो, प्लीज.

मेरा मफलर
मेरे पास एक ही मफलर था. वो मेरी नानी की निशानी थी. नानी ने मेरे दादाजी को वो मफलर दिया था. दादाजी दुनिया से रुखसत होते वक्त अपनी अमानत पिताजी को सौंप गए और फिर पिताजी ने मुझे. मैंने बड़ी हिफाजत से उस मफलर को वर्षों से संभालकर रखा था. 'आप' को परेशान देखा तो अंदर तक कांप उठा और मैंने फौरन वो मफलर आप के हवाले कर दिया. अब तो आप बगैर मफलर के ताव से हर तरफ घूम रहे हैं. अब वो मफलर भला आप के किस काम का? मेरा मफलर मुझे लौटा दो, प्लीज .

मेरी खांसी
वैसे मैं किसी को अपना बुखार तक न दूं. न जाने उस दिन क्या हो गया मुझे. मैं आपकी बातों में आ गया. मुझे लगा आप को खांसी की बहुत जरूरत है. मैंने आपको भाषण में मदद करने के लिए अपनी खांसी दी थी. आप ने तो उसे सहानुभूति का हथियार बना लिया. जब आपका काम निकल गया तो दूसरे शहर जाकर और हजारों रुपये खर्च करके आपने खांसी को भी बाहर कर दिया. अरे वो मेरी खांसी है कोई आप के राजनीतिक पैनल के सदस्य नहीं. मैं कुछ नहीं जानता. मेरी खांसी मुझे लौटा दो प्लीज.

मेरा कफ सीरप
मां के कहने पर मैंने बीड़ी छोड़ दी थी. बाद में बीवी के कहने पर दारू छोड़ दी. ले दे कर बस एक कफ सीरप ही तो बची थी. जब अंदर से तड़पता तो दो घूंट मारकर चैन की नींद सोने की कोशिश करता. आपको खांसते देख मेरा कलेजा अंदर तक हिल गया. आप ने बताया कि आप क्रोसिन खाकर चल फिर तो लेते हैं, मगर चैन की नींद नहीं आती. मुझे लगा आपको बड़े काम करने हैं. उसके लिए अच्छी नींद बेहद जरूरी है. यही सोच कर मैंने अपनी कफ सीरप आप को दे दी. जब पता चला कि आप मेरा वाला कफ सीरप छोड़ कर अदरक वाली कॉफी पीने लगे तो मैं फिर से अंदर से हिल गया. भई, ये तो सरासर धोखा है. आप मेरा कफ सीरप मुझे लौटा दो, प्लीज.

मेरा झाडू
मेरे पास एक ही झाडू था. मुझे लगा बड़ी गंदगी है. पहले 'आप' साफ कर लो. मैं तो बाद में भी साफ कर लूंगा. या फिर ऐसा कोई काम ही नहीं करूंगा कि गंदगी हो. रोकथाम तो हमेशा ही फायदेमंद रहता है. आपने तो गंदगी से भी ज्यादा झाडू इकट्ठा कर लिए. अब शायद आपको उस आम झाडू की कोई जरूरत नहीं रही. प्लीज, आप मेरा वो झाडू लौटा दो.

अब वो लोकपाल हो या जोकपाल . राइट टू रिजेक्ट की बात हो या फिर राइट टू रिकॉल की, ये सब बातें मुझे अब बिलकुल समझ में नहीं आतीं. किसी आम आदमी के पास उम्मीदों के सिवा आखिर होता क्या है. बड़ी उम्मीद थी आप से. अब वो भी जाती रही. मैंने तो आप में अपना अक्स देखा था. यही वजह रही कि आप को ठीक से जाने बगैर अपना नाम तक दे दिया. अब बहुत हो गया. बस, अब और नहीं. मेरा नाम तुम्हारे पास पड़ा है. लौटा दो, प्लीज.

मेरे ये सारे सामान तुम्हारे पास पड़े हैं, एक-एक करके सब लौटा दो, प्लीज...

अब आप का नहीं
एक आम आदमी

# मृगाङ्क शेखर [Cut/Paste from 'http://aajtak.intoday.in' where this article was originally published.]

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