Wednesday, April 15, 2015

शरद बोले - नो गारंटी

[प्रतीकात्मक तस्वीर]
व्यंग्य: सरकार बना ली, पार्टी अभी बाकी है

प्रस्तावित जनता परिवार ने पहली बाधा पार कर ली है - और शायद, आखिरी भी. वानप्रस्थ आश्रम पथ पर अग्रसर राजनीतिक संतों के घर में झगड़ा इसी बात को लेकर था कि राजा कौन बनेगा? जैसे ही दो सूबों के सियासी घरानों में रिश्ता पक्का हुआ इस परिवार का भी रास्ता साफ हो गया. लड़की पक्ष को झुकना ही पड़ता है. लड़केवालों को यहां भी तरजीह मिली - और तय हुआ कि मुलायम सिंह यादव इसके नेता होंगे. इसके साथ ही बाकियों को मनाने का बीड़ा भी लालू ने ही उठाया.

बात चलती रही. बात चली, बात टूटी. बात ठहरी, फिर चली. बात बंद तक हो गई, लेकिन आखिरकार बात बन ही गई.

मुलायम सरकार और उनके मंत्री
फिर तो मुद्दा ये नहीं रह गया कि जनता परिवार को नाम क्या दिया जाए? या, चुनावों में उतरने के लिए सिंबल और झंडा क्या हो? लाख टके का सवाल यही था कि सरकार बनी तो कौन क्या बनेगा? चूंकि राजा चुन लिया गया था, इसलिए सरकार के मंत्रियों को लेकर भी फैसला उन्हें ही करना था. इसलिए इस बाधा को भी राजा ने पहले ही दूर कर लेने का फैसला किया. जनता परिवार की भावी सरकार का ड्राफ्ट पत्र, जिसके अंत में लिखा है, 'आवश्यक होने पर अंतिम समय में फेरबदल संभव है - और उसका अधिकार आम सहमति से राजा के पास सुरक्षित होगा,' भी फौरन ही तैयार कर लिया गया.

प्रधानमंत्री - मुलायम सिंह यादव
वरिष्ठ उप प्रधानमंत्री - शरद यादव, साथ में, महिला एवं बाल कल्याण विभाग का अतिरिक्त प्रभार
उप प्रधानमंत्री - एचडी कुमारस्वामी, दुष्यंत चौटाला और ... (परिवार में कोई नया सदस्य आने पर)
विदेश मंत्री - प्रो राम गोपाल यादव
मानव संसाधन विकास मंत्री - राबड़ी देवी
गृह मंत्री - डिंपल यादव
वित्त मंत्री - हार्वर्ड रिटर्न मीसा भारती
राज्य मंत्री - धर्मेंद्र यादव, अक्षय यादव, तेज प्रताप सिंह, तेजस्वी यादव और तेज प्रताप यादव.

राष्ट्रीय सलाहकार परिषद
लालू प्रसाद यादव, ओम प्रकाश चौटाला और अभय चौटाला इसके प्रमुख सदस्य होंगे. तकनीकी कारणों से इन्हें सरकार के कामकाज में सीधे हस्तक्षेप का अधिकार तो नहीं होगा, लेकिन ये लोग केंद्र सरकार की योजनाओं के अलावा कुछ अहम मंत्रालयों, खासकर, विधि और न्याय मंत्रालय की निगरानी के साथ साथ सरकार को अपनी सिफारिशें भेज सकते हैं. लालू यादव का सबसे ज्यादा जोर अपने ड्रीम प्रोजेक्ट 'एनिमल कॉरिडोर' पर होगा, जिसे रेलवे के फ्रेट कॉरिडोर की तर्ज पर बनाया जाना है. इसी तरह चौटाला 'सबके लिए मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा कार्यक्रम' को प्रमोट करेंगे.

परिवार का 'प्लान बी'
जनता परिवार को एकजुट करने का ये सातवां प्रयास है. छह बार ये परिवार टूट कर बिखर चुका है. परिवार के सदस्यों को गर्व इस बात का है कि जब जब टूटे बड़े काम किए भले ही बाकियों का बंटाधार कर दिया हो. इसलिए कुछ सख्त नियम भी बनाए गए हैं - मसलन: हर नेता सिर्फ एक बार ही प्रधानमंत्री बन सकेगा.

मुलायम की इस भावी सरकार में नीतीश कुमार का नाम नहीं है. इसका मतलब ये नहीं कि उन्हें दरकिनार कर दिया गया है. ऐसा परिवार के 'प्लान बी' के तहत किया गया है. प्रिवेंटिव मेजर के तौर पर नीतीश को इमरजेंसी सिचुएशन के लिए सुरक्षित रखा गया है. अगर किन्हीं तकनीकी कारणों से मुलायम की राह में कोई अड़चन आ गई तो वैसी स्थिति में नीतीश को आगे किया जाएगा. इस तरह नीतीश कुमार को जनता परिवार का तुरुप का पत्ता भी माना जा सकता है, जो चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या राहुल गांधी (या कोई और संभावित दावेदार) को अच्छी टक्कर दे सकते हैं.

तो इस तरह माने देवगौड़ा
सब कुछ इतना आसान भी न था. प्रधानमंत्री पद पर सबसे पहले एचडी देवगौड़ा ने अपने पिछले अनुभव को आगे रखते हुए दावेदारी जताई थी. अभी चर्चा चल ही रही थी कि देवगौड़ा को नींद आ गई. फिर लालू ने मुलायम को प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव रख दिया - और शरद यादव ने इसका समर्थन कर दिया. बाकियों को सहमति या आपत्ति जतानी थी. जब देवगौड़ा की बारी आई तो उन्हें भी उठाया गया. आधे जगे आधे सोए देवगौड़ा ने 'हां' में सिर हिला दिया. मान लिया गया कि उन्होंने भी मंजूरी दे दी. नींद खुलते ही देवगौड़ा ने मंजूरी की बात से इंकार कर दिया. तब तक बात आगे निकल चुकी थी. 'जो सोवत है वो खोवत है...' ऊपर से शरद यादव ने हथौड़ा जड़ दिया. असल में देवगौड़ा भी मानते हैं कि पिछली बार प्रधानमंत्री पद से उन्हें सोए रह जाने के कारण ही हाथ धोना पड़ा था.

और वैधानिक चेतावनी
वैसे एक बात है. खरा खरा बोलने के मामले में शरद यादव का कोई सानी नहीं . जो भी हुआ अच्छा ही हुआ, पहले ही उन्होंने वैधानिक चेतावनी जारी कर दी, "फैशन के इस दौर में गारंटी की अपेक्षा न रखें." शरद यादव के पास जितना राजनीतिक अनुभव है उससे कहीं ज्यादा फैशन की समझ है. गोरे-काले के भेद को भला उनसे बेहतर समझने का दावा कौन कर सकता है. ये तो ऐसा मुद्दा है जिस पर बहस में वो बजट सत्र तो क्या कई शीत और ग्रीष्म सत्र भी निकाल दें - फिर भी शायद बहस अधूरी रह जाए.

अब तो तस्वीर साफ हो चुकी है कि मुलायम सरकार कैसी होगी? फिर भी पार्टी अभी बाकी है...

# मृगाङ्क शेखर [Cut/Paste from 'http://aajtak.intoday.in' where this article was originally published.]

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