Thursday, April 16, 2015

मैं और मेरा मौन व्रत

व्यंग्य: जब छुट्टी से लौटे राहुल गांधी

'खामोश' . ऐसा किसी ने बोला नहीं. बस माहौल ही ऐसा था . बिलकुल सन्नाटा. राहुल गांधी छोटेवाले काउच पर बैठे हुए थे. बीन बैग की बगल में लाल रंग का एक क्यूब स्टूल रखा हुआ था. राहुल को इस पर अक्सर स्टडी लैंप रखना अच्छा लगता है. उस वक्त वहां एक लड़की बैठी हुई थी. राहुल के साथ लड़की को देख लोग हैरान हो उठे.

लड़की को देखते ही सोनिया चौंक गईं , 'शी!' उनके मुंह से बरबस निकल पड़ा. सोनिया ही नहीं बल्कि बाकी लोग भी आश्चर्यचकित थे, वो लड़की भी. राहुल को तो पता ही था , ऐसा ही होगा. वो यूं ही खामोश और शांत रहे. मौजूद लोगों में अगर कोई सबसे सहज था तो वो थीं प्रियंका.

'या...ममा, शी.' हां में सिर हिलाते प्रियंका की ये बात और हैरान करनेवाली थी. प्रियंका की इस सहजता से सोनिया ये तो समझ गईं कि बात वो नहीं जो नजर आ रही है. लड़की सोनिया को एकटक देखे जा रही थी. बीच बीच में कभी प्रियंका तो राहुल के चेहरों पर भी उसकी नजर चली जाती. उसके लिए हैरानी की बात ये थी कि आखिर सोनिया को उसके बारे में कैसे पता? राहुल ने सोनिया को इस बारे में कुछ भी नहीं बताया था. लड़की ये बात जानती थी. सिर्फ प्रियंका को उसके बारे में पता था. बात तो सोनिया से भी होती रहती थी, लेकिन न वो पूछतीं कि राहुल कहां हैं - और न ही राहुल इस बात का जिक्र करते. सोनिया इस बात से बेफिक्र थीं कि लालू जी ने राहुल के लिए जो कुछ प्लान किया है उससे बेहतर उनके लिए हाल फिलहाल तो कुछ भी नहीं सूझ रहा था.

सोनिया को ज्यादा देर तक सस्पेंस में रखना प्रियंका को भी अच्छा नहीं लगा. फिर प्रियंका ने बताया कि लड़की कोई और नहीं बल्कि राहुल की इंटरप्रेटर है. सोनिया की बात पर हामी उन्होंने इसलिए भरी थी क्योंकि उसका नाम 'शी' है. चीन मूल की शी की पढ़ाई लिखाई लंदन में हुई जिसके बाद उसने अमेरिका से साइन लैंग्वेज में डिप्लोमा किया. शी को पहला असाइंमेंट थाइलैंड में मिला लेकिन रास्ते में ही पता चला कि क्लाइंट का ट्रिप कैंसल हो गया है. इसी बीच राहुल की टीम उनके लिए एक इंटरप्रेटर खोज रही थी. फेसबुक के जरिए शी का प्रोफाइल देखकर संपर्क साधा गया - और बात पक्की हो गई.

राहुल वैसे ही चुपचाप बैठे हुए थे. चेहरे पर गुस्से का भाव बिलकुल न था. आस पास फटे हुआ कागज या उसके टुकड़े भी नहीं नजर आ रहे थे. आगे की कहानी शी ने सुनाई, जिनमें से कुछ बातें सोनिया भी जानती थीं.

राहुल गांधी पॉलिटिकल स्टडी लीव पर जाना तो चाहते थे, लेकिन देश से बाहर नहीं. उन्हें एक ऐसी जगह की तलाश थी जहां कुदरती माहौल हो. शांति जरूर हो. इसके लिए जरूरी था कि आस पास जो लोग हों वे भी लाइक माइंडेड हों. किसी ने बेंगलुरु का नेचुरोपैथी केंद्र तो किसी ने हैदराबाद का सेंटर सजेस्ट किया. एक ने तो हरिद्वार का पतंजलि योग पीठ भी सुझाया. सबके सब रिजेक्ट कर दिए गए. आत्ममंथन के लिए किसी ने विपश्यना की सलाह दी, लेकिन वो कोर्स 10 दिन में ही खत्म हो जाता है इसलिए वो ऑटो-रिजेक्ट हो गया. इस मशवरा मीटिंग में लालू यादव भी बैठे हुए थे. लालू ने बिहार की मुंगेर योग पीठ का नाम सुझाया - और फौरन ही वो फाइनल हो गया.

मुंगेर योग पीठ में राहुल ने 'मौन व्रत' का खासा अभ्यास किया. इसमें उन्हें खूब मजा आने लगा. फिर उन्हें एक ऐसे शख्स की जरूरत समझ आई जो उनके मूक संवादों को दूसरों के लिए शब्द दे सके.

फिर राहुल को साइन लैंग्वेज सीखने की सलाह दी गई. देश में रह कर इसे सीखना इसलिए मुश्किल लग रहा था क्योंकि इसमें खलल पड़ने की आशंका थी.

बीच बीच में राहुल भी इशारों से अपनी बात रखते रहे. शी राहुल की भावनाओं को शब्द देती रही, 'ऐसा इसलिए किया क्योंकि ये ममा का फेवरेट है.'

'ममा, दिन के बाद रात - और रात के बाद दिन का चक्र चलता है. ये कुदरत का नियम है. राजनीति में भी यही नियम लागू होता है. एक चुप प्रधानमंत्री के बाद देश को एक बोलता पीएम मिला है. अब एक बार फिर खामोश पीएम की बारी है. ताकि राजनीतिक सृष्टि की ये सतत प्रक्रिया चलती रहे.'

'खामोशी में स्थाईत्व है, ममा. खामोशी हजार शब्दों पर भारी पड़ती है. 'हज़ारों जवाबों से अच्छी है मेरी खामोशी, न जाने कितने सवालों की आबरू रखी'. ये सुनकर तुमने कैसे ठहाके लगाए थे, ममा. आखिर ऐसा कितनी बार हुआ है, जब तुम जोर से हंस पाई हो.'

'ममा, जो तुम कहोगी वही करूंगा. लेकिन चुप रहूंगा. अगर मैं आपको खुश कर पाया तो मेरे लिए ये सबसे बड़ी खुशी होगी.' राहुल के इशारों पर सोनिया को शी ने समझाया. सोनिया बेहद चिंतित नजर आ रही थीं. उनके चेहरे पर तनाव बढ़ता जा रहा था. ऐसा देख प्रियंका भी थोड़ा गंभीर हो गईं. फिर शी ने एक ऐसी बात बताई जिसे सुनकर सभी के चेहरों के भाव बदल गए.

राहुल जी ने हफ्ते में सिर्फ एक दिन मौन व्रत रखने का फैसला किया है. लेकिन इसके लिए उन्हें ममा की मंजूरी चाहिए होगी.

ये सुनते ही सोनिया पूरी तरह सहज हो गईं, इसलिए प्रियंका भी. तभी आकर किसी ने बताय दिग्विजय जी आए हुए हैं, मिलना चाहते हैं. सभी लोग उठ खड़े हुए. राहुल का इशारा पाकर शी भी उनके साथ हो ली. असल में, दिग्विजय जी साइन लैंग्वेज में भी माहिर बताए जाते हैं. शी का काम वो भी कर सकते थे, लेकिन फिर बाकी काम कैसे होते?
# मृगाङ्क शेखर [Cut/Paste from 'http://aajtak.intoday.in' where this article was originally published.]

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